रविवार, 1 दिसंबर 2019

अखबार रो रहा है

कहने-सुनने में बहुत अटपटा लग रहा है कि अखबार रो रहा है। लेकिन सच यही है। वह जार-बेजार रो रहा है। किसी तहसील, जिला मुख्यालय या राज्यों की राजधानी में नहीं बल्कि पूरे देश में अखबारों की यही हालत है। वह संपादकों के अत्याचार से रो रहा है। वह सत्ता प्रतिष्ठानों के आतंक से रो रहा है। मालिकों के घुटने टेक देने के कारण रो रहा है। रही-सही कसर हमारे चुनिंदा साथियों की कामकाज से पूरी हो जाती है। 
जेहन में बड़ा सवाल कौंध रहा है कि आखिर अखबारों की सिसकियां कब खत्म होगी। कौन इसके लिए आगे आएगा। अब तो बड़े से बड़े संपादक यह कहते हुए नहीं थकते कि अखबार अपने अंतिम पड़ाव पर है और मौजूदा पीढ़ी इसके आखिरी नायक होंगे। लेकिन मैं यह कहना चाहता हूं कि अखबारों का सबसे अहित किसी ने किया तो वह संपादक हैं। क्योंकि मौजूदा दौर में 90 फीसदी संपादकों ने पढ़ना और लिखना छोड़ दिया है। आधे संपादक सत्ता प्रतिष्ठानों की दलाली करते हैं तो उनमें से कई भरपेट दारू पीकर मस्त हो जाते हैं।
मुझे याद है कि मैं एक स्वनामधन्य संपादक के साथ नौकरी करता था। वह मुझे मानते भी थे। जहां जाते, मुझे साथ ले लेते। वह अक्सर रात में नौ बजते ही मुझे साथ ले लेते और व्हिस्की की एक छोटी बोतल और स्प्राइट की एक बोतल खरीदते। मुझे कहते कि आप एक तिहाई स्प्राइट पी लीजिए। और इसके बाद वे उस बोतल में दारू मिला देते। हैरानी की बात यह कि वह इसे पीते हुए ऑफिस आ जाते और कई बार तो चैंबर में बैठकर वह दारू पीते थे। हमने पत्रकारिता शुरू की थी और मैं दारू नहीं पीता था। आज भी नहीं। मेरे लिए यह दृश्य बिल्कुल विस्मित करनेवाली थी। मैं क्या सोचकर पत्रकारिता में आया था और यह क्या देख रहा हूं। मेरा मन नहीं लग रहा था। शुरुआत के तीन महीने में छोटी-छोटी बातों पर हमने तीन बार इस्तीफा दिया और तीनों बार मेरा इस्तीफा फाड़कर फेंक दिया गया।
छोटा अखबार था। अक्सर मालिक के काम के लिए रिपोर्टर को लगाया जाता था। चूंकि मैं थोड़ा पढ़ा-लिखा व होशियार था। या कहूं तो संपादक जी मुझे पसंद करते थे। इस कारण मालिक के सभी काम के लिए मुझे लगाया जाता था। एक बार मालिक के बेटे से मुहल्ले के किसी व्यक्ति से मारपीट कर दी। फिर क्या था। हंगाम मच गया। पूरा अखबार व संपादकीय टीम के वरिष्ठ साथी बदला लेने के लिए जुट गये। एसएसपी तक को सूचना दी जाने लगी। संयोग से एसपी साहब का मोबाइल ऑफ था। सुबह का समय था और मैं सो रहा था। तभी हमारे संपादक का फोन बजा। पूछे आप सो रहे हैं और मालिक के बेटे के साथ मारपीट हो गई है। एसएसपी को फोन कीजिए। खैर लैंडलाइन नंबर पर उन्हें सूचना दी। एसएसपी साहब बोले आप पहुंचो, मैं आ रहा हूं। ....